“आरसी भार्गव ने 1956 बैच के UPSC टॉपर रहते हुए IAS की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़ दी और 1981 में मारुति उद्योग लिमिटेड में शामिल होकर इसे भारत की सबसे बड़ी कार कंपनी में तब्दील कर दिया। उनकी दूरदर्शिता, प्रबंधन कौशल और सुजुकी के साथ साझेदारी ने मध्यम वर्ग के लिए कार को सुलभ बनाया, जिससे मारुति सुजुकी आज भी बाजार में 40% से अधिक हिस्सेदारी के साथ अग्रणी बनी हुई है।”
आरसी भार्गव: एक साहसी फैसले की कहानी
आरसी भार्गव का जन्म 30 जुलाई 1934 को देहरादून में हुआ था। उन्होंने दून स्कूल से पढ़ाई की और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से गणित में एमएससी किया। इसके बाद उन्होंने विकास अर्थशास्त्र में अमेरिका के विलियम्स कॉलेज से एमए प्राप्त किया। 1956 में UPSC परीक्षा में टॉप करके वे IAS अधिकारी बने और उत्तर प्रदेश कैडर में शामिल हुए।
IAS के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण पद संभाले। वे जम्मू-कश्मीर में कृषि उत्पादन आयुक्त रहे, ऊर्जा मंत्रालय में संयुक्त सचिव बने और कैबिनेट सचिवालय में भी काम किया। उन्होंने NTPC की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। करीब 25 साल की सरकारी सेवा के बाद 1981 में एक बड़ा मोड़ आया।
उस समय इंदिरा गांधी सरकार ने संजय गांधी की मारुति मोटर्स को राष्ट्रीयकृत कर मारुति उद्योग लिमिटेड बनाई। जापान की सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन के साथ तकनीकी सहयोग से छोटी, किफायती कार बनाने का लक्ष्य था। वी कृष्णमूर्ति पहले चेयरमैन थे और भार्गव को एक साल की प्रतिनियुक्ति पर मारुति में भेजा गया। वे कंपनी के तीसरे कर्मचारी बने और मार्केटिंग एवं सेल्स डायरेक्टर के रूप में काम शुरू किया।
प्रतिनियुक्ति खत्म होने पर सरकार ने इसे बढ़ाने से इनकार कर दिया। उस समय भार्गव के सामने दो विकल्प थे – IAS में वापस लौटना या मारुति के साथ बने रहना। उन्होंने सरकार की एक नहीं सुनी और IAS से इस्तीफा देकर मारुति में स्थायी रूप से शामिल हो गए। शुरुआत में उन्हें मात्र 2250 रुपये मासिक वेतन मिला, जो IAS के मुकाबले काफी कम था। लेकिन उनका विश्वास था कि यह कंपनी भारत की सड़कों पर क्रांति लाएगी।
1983 में मारुति 800 लॉन्च हुई, जो उस समय की सबसे सस्ती कार थी। भार्गव ने किफायती कीमत, बेहतर माइलेज, कम मेंटेनेंस और विश्वसनीयता पर फोकस किया। उन्होंने डीलर नेटवर्क फैलाया, सर्विस सेंटर बढ़ाए और ग्राहक-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया। 1990 तक वे मैनेजिंग डायरेक्टर और चेयरमैन बने। 1992 में सुजुकी ने 50% हिस्सेदारी ली, लेकिन भार्गव ही नेतृत्व में रहे।
उनके नेतृत्व में मारुति ने चुनौतियों का सामना किया। 80-90 के दशक में लाइसेंस राज, सीमित संसाधन और प्रतिस्पर्धा थी। फिर भी कंपनी ने उत्पादन बढ़ाया, एक्सपोर्ट शुरू किया और मॉडल जैसे Alto, WagonR, Swift लॉन्च किए। भार्गव ने जापानी प्रबंधन शैली को भारतीय जरूरतों से जोड़ा। फ्रूगल इंजीनियरिंग, वर्कर ट्रेनिंग और सप्लाई चेन मैनेजमेंट पर जोर दिया।
आज मारुति सुजुकी भारत की सबसे बड़ी कार कंपनी है। कंपनी का बाजार पूंजीकरण लाखों करोड़ में है और पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में 40-45% शेयर है। हर साल लाखों कारें बिकती हैं और यह भारत को ऑटोमोबाइल हब बनाने में अहम भूमिका निभा रही है। भार्गव 2007 में CEO पद से रिटायर हुए लेकिन नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन बने रहे। 91 वर्ष की उम्र में भी वे कंपनी का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें पद्म भूषण और जापान के ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन से सम्मानित किया गया। भार्गव ने अपनी किताब ‘The Maruti Story’ में इस सफर को विस्तार से बताया है कि कैसे एक सरकारी कंपनी ने भारत को पहियों पर ला खड़ा किया।
उनका फैसला आज भी प्रेरणा देता है कि जोखिम लेने और दृढ़ संकल्प से असंभव को संभव बनाया जा सकता है।
| प्रमुख पड़ाव | वर्ष | विवरण |
|---|---|---|
| UPSC टॉप | 1956 | IAS अधिकारी बने |
| मारुति में शामिल | 1981 | प्रतिनियुक्ति पर तीसरे कर्मचारी के रूप में |
| IAS से इस्तीफा | 1982 | स्थायी रूप से मारुति जॉइन |
| मारुति 800 लॉन्च | 1983 | भारत की पहली मास-मार्केट कार |
| MD और CMD | 1985-1990 | कंपनी का नेतृत्व |
| सुजुकी बहुमत हिस्सेदारी | 1992 | कंपनी का विस्तार |
| CEO से रिटायरमेंट | 2007 | नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन |
Disclaimer: यह लेख उपलब्ध जानकारी और वर्तमान रुझानों पर आधारित है।






