“ईरान-अमेरिका युद्ध की आग में फंस गया भारत का चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट। अमेरिका-इजराइल की संयुक्त हमलों से तेहरान में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ गई है, जिससे अदाणी ग्रुप के हाइफा पोर्ट ऑपरेशंस सुरक्षित बताए जा रहे हैं, लेकिन चाबहार पर भारत की रणनीतिक हिस्सेदारी गंभीर खतरे में पड़ गई है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि युद्ध लंबा खिंचा तो चाबहार से जुड़े निवेश पर 30-50% तक का नुकसान संभव है, जबकि अदाणी पोर्ट्स के शेयरों में पहले ही गिरावट देखी जा रही है।”
अमेरिका और इजराइल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई से ईरान में बड़े पैमाने पर हमले हो चुके हैं, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की पुष्टि हो गई है। यह हमला 28 फरवरी 2026 को शुरू हुआ, जिसमें लगभग 900 से अधिक स्ट्राइक्स किए गए, जिनमें ईरान के कमांड स्ट्रक्चर, मिसाइल इंफ्रास्ट्रक्चर और न्यूक्लियर साइट्स को निशाना बनाया गया। ईरान ने जवाबी हमले में इजराइल और खाड़ी देशों में अमेरिकी बेस पर मिसाइलें दागीं, जिससे पूरा मिडिल ईस्ट युद्ध की चपेट में आ गया है।
भारत के लिए यह स्थिति खासतौर पर चिंताजनक है क्योंकि चाबहार पोर्ट ईरान में भारत की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति है। भारत ने 2016 से चाबहार के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को डेवलप करने में निवेश किया है। मई 2024 में भारत पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) ने ईरान के साथ 10 साल का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था, जिसमें 120 मिलियन डॉलर का उपकरण खरीद का कमिटमेंट पूरा किया जा चुका है। यह पोर्ट अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के लिए भारत का वैकल्पिक रास्ता है, जो पाकिस्तान के कराची पोर्ट पर निर्भरता कम करता है।
अदाणी पोर्ट्स का सीधा निवेश चाबहार में नहीं है, लेकिन ग्रुप ने 2017 से ही इस प्रोजेक्ट में रुचि दिखाई थी। हालांकि, मुख्य ऑपरेशन IPGL के जरिए चल रहा है, लेकिन अदाणी पोर्ट्स के ग्लोबल पोर्टफोलियो पर असर पड़ रहा है। कंपनी ने इजराइल के हाइफा पोर्ट में 70% हिस्सेदारी ली हुई है, जो मेडिटेरेनियन में यूरोप-एशिया ट्रेड का महत्वपूर्ण गेटवे है। हालिया तनाव में अदाणी पोर्ट्स ने स्पष्ट किया है कि हाइफा पोर्ट पूरी तरह सुरक्षित और ऑपरेशनल है, स्टाफ सुरक्षित हैं और इजराइली अथॉरिटीज के साथ कोऑर्डिनेशन में काम जारी है।
युद्ध के प्रभाव से चाबहार पर संभावित नुकसान:
ऑपरेशनल रुकावट : ईरान में अस्थिरता से शिपिंग रूट्स प्रभावित होंगे। पर्सियन गल्फ में टेंशन बढ़ने से जहाजों का इंश्योरेंस प्रीमियम 5-10 गुना बढ़ सकता है।
सैंक्शंस का खतरा : अमेरिका ने पहले ही चाबहार पर सैंक्शंस वेवर को अप्रैल 2026 तक बढ़ाया था, लेकिन युद्ध के बाद नई सैंक्शंस लग सकती हैं, जिससे भारत की भागीदारी मुश्किल हो जाएगी।
इन्वेस्टमेंट वैल्यू : भारत का कुल कमिटमेंट 500 मिलियन डॉलर से अधिक है (इक्विपमेंट और डेवलपमेंट मिलाकर)। लंबे युद्ध में 30-50% वैल्यू लॉस संभव, क्योंकि ट्रेड वॉल्यूम गिर सकता है।
ट्रेड इंपैक्ट : चाबहार से अफगानिस्तान को गेहूं और अन्य सामान की सप्लाई पहले ही प्रभावित हो चुकी है। युद्ध लंबा चला तो सालाना 8.5 मिलियन टन कैपेसिटी का लक्ष्य प्रभावित होगा।
अदाणी पोर्ट्स पर असर:
अदाणी पोर्ट्स के शेयर शुक्रवार को 1.98% गिरकर ₹1,519.90 पर बंद हुए थे। मिडिल ईस्ट क्राइसिस से ग्लोबल मार्केट्स में नेगेटिव सेंटिमेंट है, और सोमवार को और गिरावट की आशंका है। कंपनी के पास मुंद्रा, दावे, हाइफा जैसे प्रमुख पोर्ट्स हैं, लेकिन क्षेत्रीय अस्थिरता से शिपिंग कॉस्ट बढ़ने और ट्रेड वॉल्यूम घटने का रिस्क है।
| प्रभाव का क्षेत्र | संभावित नुकसान का अनुमान | कारण |
|---|---|---|
| चाबहार ऑपरेशंस | 30-50% वैल्यू लॉस | सैंक्शंस, हमले, शिपिंग रुकावट |
| हाइफा पोर्ट (अदाणी) | न्यूनतम प्रभाव, लेकिन सेंटिमेंट नेगेटिव | इजराइल में मिसाइल एक्टिविटी |
| अदाणी पोर्ट्स शेयर | 5-15% गिरावट संभव | ग्लोबल रिस्क ऑफ, ऑयल प्राइस वोलेटिलिटी |
| भारत-अफगानिस्तान ट्रेड | 40-60% गिरावट | वैकल्पिक रूट बंद होने का खतरा |
भारत सरकार सभी पक्षों से बातचीत जारी रखे हुए है ताकि चाबहार प्रोजेक्ट की सुरक्षा सुनिश्चित हो। लेकिन युद्ध की स्थिति में रणनीतिक निवेश पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर संघर्ष हफ्तों तक चला तो चाबहार न सिर्फ आर्थिक रूप से प्रभावित होगा, बल्कि भारत की सेंट्रल एशिया कनेक्टिविटी की महत्वाकांक्षा भी धक्का खा सकती है।
Disclaimer: यह लेख उपलब्ध जानकारी और वर्तमान घटनाक्रम पर आधारित है। बाजार और भू-राजनीतिक स्थिति तेजी से बदल सकती है। निवेश संबंधी कोई भी निर्णय व्यक्तिगत जोखिम पर लें।






